अगरवुड_की_खेती

अगरवुड: दुनिया का सबसे महंगा पेड़ जिसका इत्र और तेल सोने से भी ज्यादा कीमती होता है!
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अगरवुड को Wood of Good कहा जाता है। ऐसी मान्यता रही है कि इसके मनमोहक सुगंध भगवान को भी अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम है। इसके 1 किलोग्राम तेल की कीमत 36 लाख से भी अधिक होती है। आम जुबान में इसके तेल को लिक्विड गोल्ड भी कहा जाता है।

​अगरवुड क्या है?
अगरवुड एक सुगंधित लकड़ी होती है जिसका इस्तेमाल अगरबत्ती, इत्र आदि जैसी सुगंधित चीजों को बनाने में किया जाता है। चीन, जापान, कोरिया, मिस्र आदि में धार्मिक कर्मकांडों में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा कोरिया में औषधीय शराब बनाने में और अरब में इत्र बनाने में इसका इस्तेमाल होता है।

​कहां पाई जाती है?
दक्षिण पूर्व एशिया के घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में अकीलारिया का वृक्ष पाया जाता है। उसी वृक्ष से यह लकड़ी मिलती है। दक्षिण पूर्व एशिया के 15 देशों में इसकी करीब 26 प्रजातियां पाई जाती हैं। इंडोनेशिया, फिलिपींस, पापुआ न्यू गिनिया, मलयेशिया, ब्रुनई, भारत, कंबोडिया, सिंगापुर, थाइलैंड, चीन, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार और लाओस में अकीलारिया की अलग-अलग प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत में बात करें तो असम इसका सबसे बड़ा उत्पादक है। असम को अगरवुड कैपिटल ऑफ इंडिया कहा जाता है। वहां करीब एक लाख लोग अगरवुड ऑइल इंडस्ट्री पर सीधे आश्रित हैं। अगरवुड के तेल का इस्तेमाल इत्र बनाने में किया जाता है।

​इसका तेल सोने से भी महंगा
अगरवुड की लकड़ी की गोंद से ऑड तेल निकाला जाता है। उसी ऑड तेल का इस्तेमाल इत्र बनाने में होता है। ऑड तेल इतना महंगा होता है कि उसे लिक्विड गोल्ड भी कहा जाता है। ऑड ऑइल की कीमत 50,000 डॉलर प्रति किलोग्राम यानी करीब 36 लाख रुपये प्रति किलोग्राम है।

​नकली अगरवुड
एक तो यह दुर्लभ है और ऊपर से काफी महंगी भी जिस वजह से इसका व्यापार काफी फायदेमंद और आकर्षक है। इसे देखते हुए लोगों ने नकली अगरवुड तेल बनाना शुरू कर दिया है। लेकिन इसकी पहचान कोई प्रशिक्षित पेशेवर ही कर सकता है।

इत्र के कारोबार से सत्तर साल से जुड़े युएन वाह बताते हैं कि अगरवुड की लकड़ी हमेशा से ही महंगी बिकती रही है. पहले इस लकड़ी का इलाज के लिए इस्तेमाल होता था. इससे दर्द फौरन भाग जाता था. आज की तारीख़ में अगरवुड से निकलने वाले तेल का इत्र दुनिया भर में बेहद मशहूर है.

 अक़ीलारिया का पेड़
लकड़ी सड़ने के बाद निकलता है इत्र
अगरवुड का इत्र एक पेड़ की लकड़ी से निकाला जाता है, वो भी उसके सड़ जाने के बाद. इस पेड़ का अंग्रेज़ी नाम है अक़ीलारिया. प्राचीन काल में चीन के लोग इस पेड़ की लकड़ी को फेंग शुई के लिए बहुत इस्तेमाल करते थे.

अगरवुड का तेल निकालने के लिए अक़ीलारिया के दरख़्तों की ख़ाल उधेड़ दी जाती है. इसके बाद इनमें फफूंद अपना डेरा जमा लेते हैं. ये सड़ी हुई लकड़ी एक ख़ास तरह की राल या गोंद छोड़ती है. इसी से जो तेल निकलता है, उससे अगरवुड का इत्र बनाया जाता है.

सड़ी हुई लकड़ी से निकलने वाली राल की अहमियत इंसान को सदियों से मालूम है. इसीलिए इसे ख़ुशबू का बादशाह कहा जाता है. मध्य काल में मध्य पूर्व और एशिया के बीच कारोबार में इस इत्र का व्यापार भी शामिल हुआ करता था. चीन के टैंग और सॉन्ग राजवंशों का इतिहास खंगालें तो अगरवुड के इत्र का ज़िक्र मिलता है. इसकी ख़ुशबू का गहरा ताल्लुक़ बौद्ध, ताओ, ईसाई और इस्लाम धर्मों से रहा है.

दुनिया भर में अगरवुड की इतनी मांग है कि आज इसकी बड़े पैमाने पर तस्करी हो रही है. असल में हाँगकाँग में इसके दरख़्त बहुत कम बचे हैं. नतीजा ये हो रहा है कि इनकी लकड़ी की चोरी हो रही है. आज हाल ये है कि अक़ीलारिया के पेड़ की नस्ल ही ख़ात्मे के कगार पर पहुंच चुकी है.

एशियन प्लांटेशन कैपिटल कंपनी एशिया में अक़ीलारिया के पेड़ों की सबसे बड़ी कंपनी कही जाती है. ये कंपनी इस पेड़ की नस्ल को बचाने के लिए काम कर रही है. इसने हाँगकाँग और दूसरे देशों में इस पेड़ को लगाया है. कंपनी का कहना है कि आज की तारीख़ में अक़ीलारिया की जंगली नस्ल के कुछ ही पेड़ बचे हैं. वहीं हाँगकाँग की सरकार कहती है कि वो 2009 से अक़ीलारिया के दस हज़ार पेड़ हर साल लगा रहे हैं.

हालांकि सिर्फ़ पेड़ लगाना ही इस बात की गारंटी नहीं कि इस के पेड़ बच जाएंगे. क्योंकि अगरवुड के पेड़ों के तैयार होने में कई साल लग जाते है.

इनकी तस्करी करने वाले अक्सर पुराने पेड़ों को निशाना बनाते हैं, क्योंकि वो तैयार होते हैं. उनमें फफूंदों का डेरा पहले से ही होता है. इसलिए पुराने पेड़ों से तेल निकालने में आसानी होती है.

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