107 साल की आर. पापाम्मल दुनिया की सबसे उम्रदराज किसान है।आज भी ढाई एकड़ में ऑर्गेनिक खेती करती हैं। मिल चुका है पदम श्री सम्मान
आर. पापामल्ल यानी पूरी एक सदी को अपनी आंखों से देखने वाली बूढ़ी महिला के बारे में बात करें तो साल 1914 में जन्मी ये तमिलनाडू के कोयंबटूर जिले के एक छोटे-से गांव थेक्कमपट्टी में रहती हैं. खास बात यह है कि इस गांव की इस महिला किसान को जैविक खेती में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए भारत सरकार ने इस वर्ष 2021 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. ये हर दिन अपने ढाई एकड़ के खेत में जैविक खेती करती हैं.
आर. पापाम्मल 107 साल की हैं. फिर भी इस उम्र में जैविक खेती के लिए इनका उत्साह देख सुखद आश्चर्य होता है. उनकी संघर्षगाथा खेती और दूसरे अन्य क्षेत्र में काम करने वाले किसी भी व्यक्ति को हौसला देने के लिए काफी है. पापाम्मल को स्थानीय लोग दादी अम्मा के नाम से जानते और बुलाते हैं. पापाम्मल यानी दादी अम्मा की पूरी कहानी इस मायने में एक मिसाल हो सकती है कि कोई भी व्यक्ति कोई भी कार्य लिंग और उम्र के परे कैसे कर सकता है!
आर. पापामल्ल यानी पूरी एक सदी को अपनी आंखों से देखने वाली बूढ़ी महिला के बारे में बात करें तो साल 1914 में जन्मी ये तमिलनाडू के कोयंबटूर जिले के एक छोटे-से गांव थेक्कमपट्टी में रहती हैं. खास बात यह है कि इस गांव की इस महिला किसान को जैविक खेती में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए भारत सरकार ने इस वर्ष 2021 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. ये हर दिन अपने ढाई एकड़ के खेत में जैविक खेती करती हैं. ऐसी उम्र में जब लोग जीने के बारे में सोचना भी बंद कर देते हैं तब ये दादी अम्मा हरे-भरे केले के बागीचे के बीच काम करती नजर आती हैं. इनका छोटा-सा खेत ही इनकी अपनी कर्मभूमि है, जहां काली मिट्टी में उगने वाली हरी फसलों के बीच ये दिन-दिन भर अपना पसीना बहाती हैं।
यदि रंग-रुप की बात करें तो ये दादी अम्मा बिल्कुल वैसी ही हैं जैसी अन्य दादियां होती हैं- झुर्रियों वाली. लेकिन, ये इस अर्थ में उनसे अलग भी हैं कि इनके झुर्रियों वाले चेहरे पर अभी भी जीने की उम्मीद और खुशी झलकती है. ये दादी अम्मा कभी मृत्यु की बात नहीं करतीं. इन्हें अपने खेत से खूब प्यार जो है और खेत में काम करते हुए ये आज भी जीवन का पूरा आनंद उठा रही हैं. ये अन्य दादियों की तरह समान इस अर्थ में हैं कि इन्हें भी उन्हीं की तरह कहानियां सुनाना पसंद है. लेकिन, इनकी कहानियों की विषयवस्तु अलग होती है क्योंकि ये खेती, खेत की मिट्टी, फसलों और उन्हें उगाने के लिए किए गए अभिनव प्रयोगों के बारे में कहानियां सुनाती हैं.
देखें तो खेती के प्रति इनका अनूठा प्रेम ही इनकी जिंदादिली की वजह है. मूलत: खेती-किसानी के मूल्य इनकी शख्सियत और बोली में इस तरह रचे-बसे हैं कि आज की पीढ़ी के लिए ये प्रेरणादायी हैं. वहीं, इनके खेतों की ओर देखें तो इनके खेत इनके जीवित रहने और लंबी उम्र की निशानी की तरह लगते हैं.
कोई छह फीट लंबा कद, मजबूत काठी, धनुष की तरह सधी रीढ़ और कभी न थकने वाले पैर...और हां, इनके सिर पर सफेद बाल इनके सौंदर्य को एक नया आयाम देते हैं. ये सहज मीठी बोली बोलती हैं और आज भी इनकी स्मरण-शक्ति बहुत अच्छी है. ये दिमाग से जवान और विचारों में स्पष्टता रखने वाली महिला हैं. इनकी एक खासियत यह है ये दादी-अम्मा लगातार अपने इर्द-गिर्द के लोगों को भी सक्रिय रहने और लगातार काम करने के लिए प्रेरित करती हैं.
पापाम्मल का जन्म एक किसान परिवार में देवलपुरम नाम के छोटे-से गांव में हुआ था. उनके परिजन अपने खेतों में अनाज उगाने के लिए सिर्फ कड़ी मेहनत पर विश्वास करते थे. इसलिए खेतों में परंपरागत तरीके से कड़ी मेहनत करना इन दादी-अम्मा के खून में ही है. आज से सौ साल पहले जन्मी पापाम्मल ने नन्हीं उम्र में ही अपने माता-पिता की छत्रछाया खो दी थी. फिर आगे की परवरिश इन्हें थेक्कमपट्टी गांव में ही मिली, जहां इनके दादा-दादी और इनकी दो बहनों ने इन्हें पाला-पोसा और बड़ा किया. फिर दादी-अम्मा ने 30 साल की उम्र में अपने लिए खेत खरीदा और तब से लगातार उस पर खेती करती आ रही हैं.
भारत सरकार के पद्म पुरस्कार से सम्मानित इस व्यक्तित्व को बचपन में स्कूली शिक्षा नसीब नहीं हो सकी. फिर भी दक्षिण भारत के घरों में उस समय की पारंपरिक शिक्षा के कारण इन्होंने जोड़-घटाना, गुणा-भाग और अक्षर ज्ञान जान लिया था. ये कहती हैं, "उस समय पांचवीं तक की पढ़ाई करनी बहुत बड़ी बात हुआ करती थी. पांचवीं करने पर शिक्षक की नौकरी मिल जाती थी." लेकिन, छोटी उम्र में जब ये स्कूल न जा सकीं तो अपने परिवार के साथ खेतों की मिट्टी में खेलती और खेती करना सीखने लगीं.
धीरे-धीरे इनके लिए खेत ही कार्यक्षेत्र बन गए. ये आज बताती हैं कि बिना शिक्षा हासिल करें ही इन्होंने खेती की बारीकियों को सीखा. इनके यहीं हुनर को अब कई पढ़े-लिखे लोग कृषि-विज्ञान की दृष्टि से देख-समझ रहे हैं. एक साधारण किसान महिला से जैविक खेती में इनके द्वारा दिए गए योगदान तक की यह यात्रा बहुत आश्चर्यजनक और रोचक है.
इस उम्र में दादी आज भी सुबह करीब साढ़े पांच बजे उठती हैं. घर के सारे काम खत्म करने के बाद ये अपने प्यारे खेतों की ओर अपने कंधों पर खेती के औजार लेकर चल पड़ती हैं और शाम को छह बजे तक खेतों में ही काम करती हैं. केलों के प्रति दादी अम्मा का विशेष प्रेम है और इन्हें केले खाना पसंद हैं. ये तमिलनाडू में कृषि विश्वविद्यालय के छात्रों को भी जैविक शिक्षा का व्यवहारिक ज्ञान देती हैं. इस दौरान दादी अम्मा खुद के खेत में खेती का काम करते हुए छात्रों और अन्य किसानों के साथ अपने अनुभव साझा करती हैं. इस दौरान ये यह भी बताती हैं कि जैविक खेती के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए. साथ ही फसल की अच्छी और जहर-मुक्त पैदावार के लिए विभिन्न पद्धतियों के बारे में भी ये सभी का अच्छी तरह से मार्गदर्शन करती हैं.
जैविक खेती के बारे में इनकी समझ को लेकर न सिर्फ गांव की नई पीढ़ी बल्कि कृषि क्षेत्र के जानकार भी इन्हें सलाम करते हैं. दादी अम्मा द्वारा खेत में की जाने वाली मेहनत को देख कृषि क्षेत्र के छात्र भी अचंभित होते हैं कि काम के लिए दादी अम्मा मजदूर नहीं रखती हैं. कई बार प्यार से ये दादी अम्मा युवा छात्रों को गले भी लगाती हैं और उन्हें पुचकारती हुई कहती हैं, "मैं इतनी बूढ़ी हो गई हूं कि मैं पूरे दिन काम नहीं कर पाती हूं और आप कैसे थक जाते हैं? चलो, बहुत हुआ अब मेरे साथ ही काम करो!"
दादी अम्मा के परिजन कहते हैं कि इनका खान-पान और कामकाज की जीवनशैली इनकी लंबी उम्र का राज है. इनकी बहन के पोते आर. बालासुब्रमण्यम बताते हैं कि मटन बिरयानी और तरह-तरह की हरी सब्जियां दादी अम्मा का पसंदीदा भोजन है. ये कभी भी प्रकृति के करीब जाने का अवसर नहीं छोड़ती हैं. ये अपना भोजन मिट्टी के बर्तनों में पकाती हैं और केले के पत्ते पर भोजन करती हैं. ये कभी चाय या कॉफी नहीं पीती हैं. इस उम्र में भी नई चीजों को सीखने के मामले में दादी अम्मा की इच्छाएं अनंत हैं. प्रश्न है कि दादी अम्मा जैविक खेती कब से कर रही हैं. इस बारे में खुद दादी अम्मा बताती हैं कि वे पारंपरिक तरीके से जो खेती करती आ रही हैं तो खुद उन्हें पता नहीं था कि इसे ही जैविक खेती कहते हैं. फिर किसानों की एक बैठक में दादी अम्मा ने एक दिन जैविक खेती के बारे में सुना और अपने खेतों में लौटकर नए-नए प्रयोग करने लगीं.
ये कहती हैं, "रासायन हमारी फसलों, मिट्टी और लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी अच्छे नहीं हैं. इस कारण से हमने जैविक खेती की ओर रुख किया है. इसमें नए प्रयोग किए हैं. ये प्रयोग सफल और लोकप्रिय रहे." बता दें कि दादी अम्मा के ये प्रयोग उनके खेतों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि अन्य किसानों द्वारा भी जैविक खेती की अवधारणा को फैलाने के लिए उपयोग किए जा रहे हैं. इससे किसानों को जैविक खेती के बारे में जानकारी मिल रही है और कई किसान जैविक खेती को अपना रहे हैं. दरअसल, दादी अम्मा ने मन बना लिया है कि ज्यादा नहीं सोचेंगी, बल्कि जो करने का फैसला करेंगी उसे पूरा करने में लग जाएंगी. यही सोचकर ये अपने लक्ष्य की ओर पीछा करती रहती हैं.
दादी अम्मा कहती हैं, "देश को जैविक खेती के लिए और किसानों की जरूरत है. यह वह समय है जब लोगों को फिर से जैविक खेती की ओर रुख करना चाहिए. मुझे उम्मीद है कि मेरी कहानी सुनने के बाद भी लोग जैविक खेती की ओर रुख करेंगे और मेरी तरह मेहनत करने की तैयारी करेंगे. किसी को आलसी नहीं होना चाहिए." लेकिन, इनकी एक शिकायत है कि आज के युवा जल्दी में बहुत कुछ पाना चाहते हैं. इसलिए युवाओं के पास जैविक खेती में निवेश करने का समय नहीं है.
अंत में ये कहती हैं, "सौ साल से ज्यादा उम्र की होने के बाद भी मैं हैरान हूं कि मुझे पद्मश्री के लायक समझा गया. मुझे इस पर गर्व भी महसूस होता है. मैं अभी भी इस उम्र में खेती से जुड़े काम करती हूं, मुझे अभी भी इसमें आनंद मिलता है कि खेती के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए हर दिन 50 से 100 लोग मेरे पास आते हैं." दादी अम्मा के पोपले गालों पर पड़ती हर मुस्कान मानो उनके जीवन की सार्थकता को व्यक्त करती है. उनके व्यक्तित्व की यह झलक भी सामने वाले व्यक्ति के लिए प्रेरणादायक सिद्ध हो सकती है।