फरवरी माह में आम , लीची,केला एवम् पपीता में किए जाने वाले प्रमुख कृषि कार्य
जनवरी माह में उत्तर भारत में अत्यधिक ठंढक की वजह से केला एवं पपीता जैसे फल फसलों के विकास पर बहुत ही विपरित प्रभाव पड़ता है ,बाग बीमार एवं रोगग्रस्त दिखाई देते है ।फरवरी माह में जब तापक्रम बढ़ने लगता है , उस समय बाग पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है अन्यथा आशातीत लाभ नहीं मिलेगा ।आम , केला ,लीची एवं पपीता के बाग के प्रबंधन में फरवरी माह का विशेष स्थान है। आइए जानते है इस माह में क्या करना चाहिए....
आम एवम् लीची में इस समय किए जाने वाले प्रमुख कृषि कार्य
आम एवं लीची के नये बागों में या जो बाग अभी फलन में नही आनेवाले हो उनके आस-पास चारों तरफ धास-फूस की पुआल या पालीथीन (100 Mesh) से मल्चिंग करना अच्छा रहता है। ऐसे बागों में हल्की-हल्की सिंचाई करना श्रेयकर रहता है। ऐसे बाग जहाॅं पर दीमक की समंस्या हो क्लोरोपरीफास 20 EC @ 2.5 मीली/लीटर की दर से मुख्य तने या उसके आस-पास की मिट्टी में छिड़काव करने से दीमक की उग्रता में कमी आती है।
ऐसे आम एवं लीची के बाग जिसमें निकट भविष्य में फूल आनेवाले हो उसमें इमिडाक्लोप्रीड (17.8 SL) @0.5 मीली/लीटर एवं हेक्सा कॉनाजोल ( हेककॉनाजोल) 1 मिलीलीटर/लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से क्रमशः हापर एवं चूर्णिल आसिता के साथ साथ अन्य फफूंद जनित रोगों की उग्रता में कमी आती है। आम एवम् लीची में एक बार फूल के खिल जाने के बाद किसी भी प्रकार का कृषि रसायन का छिड़काव नहीं करना चाहिए ,क्योंकि इससे फूल को नुकसान पहुंचने की संभावना रहती है एवम् परागण प्रभावित होता है। इस तरह के बागों में सिंचाई तब तक न करें जब तक फल पूरी तरह से न लग जाए अन्यथा नुकसान हो जाएगा।
केला
अत्यधिक ठंढक की वजह से केला की अधिकांश पत्तियां सुख जाती है ,सभी सुखी एवं रोगग्रस्त पत्तियों को काटकर खेत से बाहर करें जिससे रोग की उग्रता में कमी आयेगी। इसके बाद हल्की गुड़ाई करने के बाद प्रति केला 200 ग्राम यूरिया, 200 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश एवं 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग करें। समयानुसार हल्की हल्की सिचांई करते रहे अप्रैल आते आते केला का बाग पुनः हरा भरा दिखाने लगेगा।
पपीता
अक्टूबर में लगाए गए पपीता में निराई-गुड़ाई करे , हल्की गुड़ाई करने के बाद प्रति पौधा 100 ग्राम यूरिया, 50 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश एवं 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग करें। समयानुसार हल्की हल्की सिचांई करते रहे । पपीता में लगने वाले जड़ फलन एवं विषाणु जनित रोगों के लिए बताए गए उपाय को हर महीने करते रहे। मार्च अप्रैल में पपीता लगाने के लिए ,पपीता के बीज को नर्सरी में डाले।