मुनाफे का सौदा है आडू की खेती!
गर्मियों में मिलने वाला आड़ू स्वादिष्ट होने के साथ-साथ सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है। इसमें पाए जाने वाले विटामिन, एंटीऑक्सीडेंट्स और मिनरल्स वजन कम करने के साथ आंखों की रोशनी बढ़ाने में भी मदद करते है। साथ ही इसके रोजाना सेवन त्वचा को डिटॉक्स करके ग्लोइंग भी बनाता है।
आडू की गिनती गुठली वाले फलों में होती है. किसान भाई इसकी खेती नगदी फसल के रूप में करते है. आडू की उत्पत्ति का स्थान चीन और ईरान को बताया जाता है. आडू के ताजे फलों का इस्तेमाल खाने में किया जाता है. इसके अलावा आडू से कैंडी, जैम और जैली जैसी चीजें भी बनाई जाती है. इसके फल में शक्कर की मात्रा ज्यादा पाई जाती है. जिस कारण इसका फल अधिक स्वादिष्ट और रसीला होता है.
आडू की खेती
आडू की खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु की जरूरत होती है. आडू का पौधा एक बार लगाने के बाद कई सालों तक पैदावार देता है. भारत में इसकी खेती पर्वतीय भू-भागों में की जाती है. इसकी खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए. वर्तमान इसको उत्तर भारत के मैदानी भागों में भी उगाया जा रहा है.
उपयुक्त मिट्टी
आडू की खेती के लिए हल्की दोमट और बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. इसकी खेती के लिए जल भराव वाली और कम उपजाऊ भूमि उपयुक्त नही होती. जल भराव होने पर इसके पौधों में रोग लग जाते हैं. इसकी खेती के भूमि का पी.एच. मान मान 5.5 से 6.5 के बीच होना चाहिए.
जलवायु और तापमान
आडू की खेती के लिए समशीतोष्ण और शीतोष्ण दोनों ही जलवायु उपयुक्त होती है. इसके पौधों को विकास करने के लिए गर्मी के मौसम की जरूरत होती है. जबकि अच्छी गुणवत्ता के फलों के लिए सर्दी के मौसम की जरूरत होती है. आडू की खेती समुद्र तल से 750 से 1800 मीटर ऊंचाई वाले भू-भागों में की जाती है. इसकी खेती उन जगहों पर नही की जा सकती जहां सर्दियों के दौरान देर से पाला पड़ता है. इसके पौधे पर फूल आने के दौरान होने वाली बारिश नुकसानदायक होती है.
आडू की खेती के लिए तापमान की ख़ास जरूरत होती है. इसके पौधों को शुरुआत में विकास करने के लिए 20 डिग्री के आसपास तापमान की जरूरत होती है. उसके बाद इसके पौधे सर्दियों में न्यूनतम 4 डिग्री और गर्मियों में अधिकतम 30 डिग्री तापमान को सहन कर सकते हैं. जबकि इसके पौधों पर फलों के लगने के बाद पकने के दौरान निश्चित समय तक 7 डिग्री तापमान की जरूरत होती है.
आडू की खेती के लिए खेत की तैयारी के वक्त शुरुआत में खेत में मौजूद पुरानी फसलों के अवशेषों को नष्ट कर दें. अवशेषों को नष्ट करने के बाद खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर दें. उसके बाद खेत में मौजूद ढेलों को रोटावेटर के माध्यम से भुरभुरी मिट्टी में बदल दें. मिट्टी को भुरभुरा बनाने के बाद पाटा चलाकर खेत को समतल बना लें. ताकि बारिश के मौसम में जल भराव जैसी समस्या का सामना ना करना पड़ता.
आडू के पौधों को खेत में गड्डे तैयार कर लगाया जाता है. खेत में गड्डे बनाने के दौरान इन गड्डों का आकार एक मीटर चौड़ाई और दो से ढाई फिट गहराई का होना चाहिए. गड्डों को तैयार करते वक्त प्रत्येक गड्डों के बीच 5 से 7 मीटर की दूरी रखते हुए पंक्तियों में तैयार किया जाता है. और प्रत्येक पंक्तियों के बीच लगभग 5 से 6 मीटर की दूरी होनी चाहिए.
गड्डों के तैयार होने के बाद उनमें उचित मात्रा में जैविक और रासायनिक उर्वरक को मिट्टी में मिलाकर भर देते हैं. गड्डों को भरने के बाद उनकी गहरी सिंचाई कर उन्हें पुलाव या सुखी घास से ढक देते हैं. जिससे मिट्टी और खाद अच्छे से अपघटित हो जाते हैं. इन गड्डों को पौध रोपाई से एक महीने पहले तैयार किया जाता है.
पौध तैयार करना
आडू के पौधों को बीज और कलम के माध्यम से पहले नर्सरी में तैयार किया जाता है. बीज के माध्यम से पौध तैयार करने पर पौधों में मातृवृक्ष के गुण कम देखने को मिलते हैं. और पौधे फल भी काफी समय बाद देना शुरू करते हैं. इस कारण इन्हें कलम के माध्यम से तैयार किया जाता है. कलम के माध्यम से पौध तैयार करने के लिए कलम रोपण और ग्राफ्टिंग की विधि का इस्तेमाल किया जाता हैं.
इसके अलावा वर्तमान में सरकार द्वारा रजिस्टर्ड कई नर्सरी और संस्थाएं हैं, जो इसकी पौध किसान भाइयों को कम दाम पर देती है. नर्सरी से ख़रीदे गए पौधे जल्द ही पैदावार देना शुरू कर देते है. इससे किसान भाइयों की मेहनत और समय दोनों का बचाव हो जाता है. लेकिन नर्सरी से पौध खरीदते वक्त ध्यान रखे की केवल उन्ही पौधों को खरीदें जो पौधा एक साल से ज्यादा उम्र का हो और अच्छे से विकास कर रहे हों. साथ ही उन पर किसी तरह का कोई रोग भी ना लगा हों.
पौध रोपाई का तरीका और टाइम
आडू के पौधों की रोपाई
आडू के पौधों को खेत में तैयार किये गए गड्डों में लगाया जाता है. इसके लिए पहले गड्डों के बीचोंबीच एक छोटे आकार का गड्डा तैयार कर लें. छोटे गड्डे तैयार करने के बाद उन्हें बाविस्टिन या गोमूत्र से उपचारित कर लेना चाहिए. उसके बाद पौधों की पॉलीथीन को हटाकर उन्हें गड्डों में लगा दें. पौधों को गड्डों में लगाने के बाद उनके चारों तरफ जड़ से एक सेंटीमीटर ऊंचाई तक मिट्टी डालकर अच्छे से दबा दें.
आडू के पेड़ो को सर्दी के मौसम में लगाना अच्छा होता है. इस दौरान इसके पौधों को दिसम्बर और जनवरी माह में उगाना चाहिए. इसके अलावा अधिक ठंडे पर्वतीय प्रदेशों में इन्हें फरवरी माह में भी उगा सकते है.
पौधों की सिंचाई
आडू के पौधों को सामान्य सिंचाई की जरूरत होती है. शुरुआत में इसके पौधों को खेत में लगाने के तुरंत बाद पानी दे देना चाहिए. सर्दियों के मौसम में आडू के पौधों को सिंचाई की कम आवश्यकता होती है. इस दौरान पौधों को महीने में दो बार पानी देना काफी होता है. जबकि गर्मियों के मौसम में इसके पौधों को सप्ताह में एक बार पानी देना अच्छा होता है.
आडू के पूर्ण रूप से तैयार पेड़ो को साल में 10 से 12 सिंचाई की जरूरत होती है. इनमें से ज्यादातर सिंचाई पेड़ो पर फल बनने के दौरान की जाती है. इसके पेड़ो पर जब फल बन रहे हों तब पेड़ो की हल्की हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए. इससे फलों का आकार अच्छा बनता है. लेकिन जब फल पकने लगे तब सिंचाई कुछ दिन पहले बंद कर देनी चाहिए. इससे फलों की गुणवत्ता अच्छी बनती है.
उर्वरक की मात्रा
आडू के पौधों को बाकी बागवानी फसलों की तरह सामान्य मात्रा में उर्वरकों की जरूरत होती है. इसके लिए शुरुआत में गड्डों की तैयारी के वक्त प्रत्येक गड्डों में लगभग 10 से 15 किलो पुरानी गोबर की खाद और 400 से 500 ग्राम एन.पी.के. की मात्रा को मिट्टी में मिलाकर गड्डों में भर दें. पौधों को उर्वरक की ये मात्रा दो से तीन साल तक देनी चाहिए.
लेकिन जब पौधा बड़ा हो जाये तब पौधों को दी जाने वाली उर्वरक की इस मात्रा को पौधों के विकास के साथ साथ बढ़ा देनी चाहिए. जब आडू का पौधा फल देना शुरु कर दें तब प्रत्येक पेड़ो को सालान 25 किलो के आसपास जैविक खाद और एक किलो रासायनिक खाद देना चाहिए. इससे पेड़ो के विकास और पैदावार दोनों पर फर्क देखने को मिलता है. पेड़ो को उर्वरक की ये मात्रा फूल बनने से पहले नवम्बर या दिसम्बर माह के शुरुआत में देना अच्छा होता है.
पौधों की देखभाल
आडू के पौधों को देखभाल की खास जरूरत होती है. इसके लिए शुरुआत में पौधों को खेत में लगाने के बाद खेत की तारबंदी कर दें. ताकि आवारा पशु पौधों को नुक्सान ना पहुंचा पाये. इसके अलावा पौधों को अच्छा आकार देने के लिए शुरुआत में एक मीटर की लम्बाई तक पौधों पर किसी भी तरह की शाखा को जन्म ना लेने दें. इससे पौधे का तना भी मजबूत बनता है.
जब पौधे फल देना शुरू कर दें तब उनकी उचित समय पर कटाई छटाई कर देखभाल करनी चाहिए. कटाई छटाई के दौरान पेड़ो पर मौजूद रोग ग्रस्त और सूखी हुई डालियों को निकाल देना चाहिए. इससे पेड़ो में नई शाखाओं का निर्माण होता है. जिससे पेड़ो की पैदावार में भी फर्क देखने को मिलता है. आडू के पेड़ो की कटाई छटाई उन पर फूल बनने से लगभग एक महीने पहले उर्वरक देने के दौरान कर देनी चाहिए.
खरपतवार नियंत्रण
आडू के पौधों में खरपतवार नियंत्रण प्राकृतिक तरीके से करना अच्छा होता है. इसके लिए पौधों को खेत में लगाने के बाद शुरुआत में उनकी हर महीने हल्की गुड़ाई करते रहना चाहिए. जब इसका पौधा पूर्ण रूप से तैयार हो जाता हैं तब इसके पौधे को साल में दो गुड़ाई की ही जरूरत होती है. इसके अलावा पौधों के बीच मौजूद खाली जमीन में अगर किसी तरह की कोई फसल ना उगाई गई हो तो बारिश के बाद जब जमीन सूख जाने पर खेत की जुताई कर देनी चाहिए. इससे खाली जमीन में खरपतवार जन्म नही ले पाती हैं.
अतिरिक्त कमाई
आडू के पौधों को खेत में लगाने के तीन से चार साल बाद पैदावार प्राप्त होती है. इस दौरान किसान भाई खेत में खाली पड़ी भूमि में सब्जी, मसाले, औषधीय और कम समय की बागबानी फसलों को उगाकर अच्छी कमाई कर सकता है. इससे किसान भाइयों को उनके खेत से पैदावार भी मिलती रहती है. और उन्हें किसी तरह की आर्थिक समस्या का सामना भी नही करना पड़ता.
Gardener dost