मक्के की अपेक्षा बेबी कॉर्न

मक्के की अपेक्षा बेबी कॉर्न की खेती में है ज्यादा मुनाफा। एक हेक्टेयर की खेती से होती है चार लाख की कमा
Gardener dost
 बेबी कॉर्न नाम तो सुना ही होगा।  वेजिटेरियन लोगों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है  । फ्राइड बेबी कॉर्न, इसका सलाद ,पकोड़े और सूप का लजीज स्वाद हर शाकाहारी का पहला चॉइस बन गया है।बेबी कॉर्न को सबसे स्वस्थ वेजी माना जाता है। 
दरअसल बेबी कॉर्न रेगुलर कॉर्न के समान होता है, लेकिन उन्हें परिपक्व होने से पहले चुना जाता है। इसके अलावा, बेबी कॉर्न और कॉर्न का पौष्टिक मूल्य एक-दूसरे से थोड़ा भिन्न होता है। वजन कम करने के दौरान बेबी कॉर्न बहुत फायदेमंद होते हैं क्योंकि इसमें कम स्टार्च होते हैं। इसके अलावा, बेबी कॉर्न में मैग्नीशियम, विटामिन ए, आयरन और फॉस्फोरस जैसे आवश्यक पोषक तत्व होते हैं और ये सभी इसे स्वस्थ भोजन बनाते हैं। 
#बेबी_कॉर्न_की_खेती

बेबी कॉर्न की खेती की सबसे बड़ी खासियत तो यह है कि से साल में इसका चार बार उत्पादन किया जा सकता है। हां एक बात का ख्याल रखना चाहिए कि एक साथ
 साथ पूरे खेत में बेबी कॉर्न की बुवाई नहीं करनी चाहिए। इसे दस-दस दिन के अंतर में खेत के कुछ हिस्सों में बोना चाहिए क्योंकि अगर किसान एक साथ पूरे खेत में बुवाई करता है, तो पूरी फसल एक साथ तैयार हो जाती है। तब बाजार में बेचने में कुछ दिक्कत होती है इसलिए कुछ अंतराल पर बुवाई करने से जैसे-जैसे फसल तैयार होगी बाजार में बेच सकते हैं। इसके डंठल और पत्ते जानवरों के लिए पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इसकी खेती से तो सालभर जानवरों को चारा उपलब्ध हो सकता है।

 उत्तर भारत में दिसम्बर, जनवरी महीने को छोड़ सालभर बेबी कॉर्न की खेती की जा सकती है। मध्यम ऊंचाई की जल्दी तैयार होने वाली किस्म/प्रजाति और एकल क्रॉस संकर का चयन करना चाहिए। संकर-बीएल, संकर-एमईएच-133, संकर-एमईएच-114 और अर्ली-कम्पोजिट बेबी कॉर्न की उन्नत किस्म होती हैं।

बेबीकॉर्न की बुवाई के लिए किसान सबसे पहले खेत में मेड़ बना लें और इसकी चौड़ाई एक फीट रखें। बुवाई से पहले खेतों में 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस व 40 किलोग्राम पोटाश का छिड़काव करें। मेड़ पर बुवाई से पानी कम लगता है और पैदावार अच्छी होती है।

सिंचाई
पहली सिंचाई बुवाई से पहले करें, क्योंकि बीज अंकुरण के लिए पर्याप्त नमी होना जरूरी होता है। बुवाई के 15-20 दिन बाद मौसम के अनुसार जब पौधे 10-12 सेमी के हो जाएं तो पहली सिंचाई करनी चाहिए। उसके बार 8-10 दिन के अन्तराल से ग्रीष्मकालीन फसल में पानी देते रहना चाहिए।

खरपतवार-नियंत्रण
इस मौसम में बोई गई फसल में खरपतवार या जंगली घास हो जाती हैं जिनको निकालना जरूरी होता है। इन्हें निकालने के लिए 2-3 खुरपी से गुड़ाई करें क्या साथ-साथ हल्की-हल्की मिट्‌टी भी पौधों पर चढ़ा दें, जिससे पौधे हवा से गिरते नहीं हैं। इसके दूसरी फसलें भी लगा सकते हैं, इस समय इसके साथ लोबिया, उड़द, मूंग जैसी फसलें लगा सकते हैं।

 बड़ी-बड़ी रेस्‍टोरेंट चेन और होटलों में अच्‍छी-खासी डिमांड होने के चलते इसकी कीमत भी अच्‍छी मिलती है। यदि एक हेक्‍टेयर भूमि में बेबी कॉर्न की खेती का मॉडल समझा जाए तो इससे सालभर में 3 से 4 लाख रुपए की इनकम आसानी से की जा सकती है। जबकि, एक बार में लागत 10 से 15 हजार रुपए प्रति हेक्‍टेयर की आती है। इस हिसाब से देखा जाए तो शुद्ध लाभ 2.5 लाख रुपए से 3.5 लाख रुपए अर्जित किया जा

बेबी कॉर्न की तुड़ाई
बेबी कॉर्न की भुट्टा को एक से तीन सेमी. सिल्क आने पर तोड़ लेनी चाहिए। भुट्टा तोड़ते समय उसके ऊपर की पत्तियों को नहीं हटाना चाहिए। पत्तियों को हटाने से ये जल्दी खराब हो जाती है।
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